समलैंगिकता को अपराध बताने वाले अपने फैसले पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट आईपीसी की धारा 377 यानी समलैंगिकता को अपराध बताने वाली धारा को सही ठहराने वाले अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हो गया है. साथ ही इस मामले को बड़ी बेंच को रेफर कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट में नाज फाउंडेशन ने दलील दी कि कोर्ट के 2013 के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है क्योंकि हमें लगता है कि इसमें संवैधानिक मुद्दे जुड़े हुए हैं. दो व्यस्कों के बीच शारीरिक संबंध क्या अपराध हैं, इस पर बहस जरूरी है. अपनी इच्छा से किसी को चुनने वालों को भय के माहौल में नहीं रहना चाहिए. कोई भी इच्छा को कानून के चारों तरफ नहीं रह सकता लेकिन सभी को अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार के तहत कानून के दायरे में रहने का अधिकार है.

नाज फाउंडेशन ने याचिका में कहा कि सामाजिक नैतिकता वक्त के साथ बदलती है. इसी तरह कानून भी वक्त के साथ बदलता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने को कहा है.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में नवतेज सिंह जौहर, सुनील मेहरा, अमन नाथ, रितू डालमिया और आयशा कपूर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा है कि कोर्ट को समलैंगिकों के संबंध बनाने पर आईपीसी 377 के कार्रवाई के अपने फैसले पर पुनःविचार करे. याचिका कर्ताओं का कहना है कि इसकी वजह से वो डर में जी रहे हैं और ये उनके अधिकारों का हनन करता है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 समलैंगिक यौन संबंध (पुरुष-पुरुष तथा महिला-महिला) स्थापित करने को अपराध करार देती है, जिसे नाज़ फाउंडेशन मामले में दिए फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने गलत ठहराया था, और इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. लेकिन कुछ ही साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए धारा 377, यानी होमोसेक्सुअलिटी को फिर अपराध करार दे दिया था.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ‘गलत‘ करार देते हुए 2 फरवरी, 2016 को वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में कहा था कि दो वयस्कों के बीच बंद कमरे में आपसी सहमति से बने संबंध संवैधानिक अधिकार का हिस्सा हैं. हालांकि अदालत में मौजूद चर्च के वकील और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकीलों ने इस याचिका का विरोध किया था. तत्कालीन सीजेआई टीएस ठाकुर ने मामले को पांच जजों के संविधान पीठ में भेज दिया था.

दरअसल, 2013 में फैसला सुनाते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 में बदलाव करने से मना कर दिया था और कहा था कि कानून में बदलाव करना संसद का काम है.

Supreme Court reconsider own decision on homosexuality

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